यूँ भी सोचा जाए :
शब्दों में भरती है स्याही
हमारे सोच की कलम
हरे रंग में भर दिए जाते हैं
कुछ चहकते पत्ते
इठलाती चाल में जैसे
रख दिए जाते हैं पानी के पैर
सुगंध में सराबोर कर दिए जाते हैं
मोगरे के फूल
नीले रंग को उछाल उछाल कर
बना दिया जाता है आकाश
आवाज़ के घर में
एक नन्हा सा दिल
और भावनाओं के चादर पे
सुला दिया जाता है इंसान
उसकी सिलवटें बन जाती है

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