नंगे पैर
किसी नए शहर में चलना शायद कौतुहल को
ढूँढने जैसा होता है. सड़कें लम्बी लगने लगती हैं, मगर चौड़ी नहीं. कई लोगों
से टकराना होता है, कई दुकानों की खिड़कियां हथेलियों से छूती हैं. मैं
हमेशा इसी तरह एक शहर देखती हूँ. दिशाओं को याद रखना मुश्किल लगता है, तो
लोगों के चहरे, विज्ञापन से भरी हुई इमारतें, कुछ पेड़- आड़े, तिरछे, ये सब
मेरे दिशासूचक बन जाते हैं. प्राग में मेरा यह दूसरा दिन था. पहले दिन
जूतों से पैर छिल गए थे, लेकिन आज आराम करने का मन ही कहाँ। लगता है की
जैसे समेट लूँ, चल कर सारे शहर को.
अपने वही जूते
निकाले मैंने, और साथ में एक बैग. हालांकि ज़्यादा कुछ रखने को नहीं मेरे
पास, मगर बैग को टाँगे बिना अनमना सा लगता है. अजीब है, चीज़ें भी अंग के
मुकाबले हो जाती हैं. बाहर मौसम कुछ ठंडा सा है, तो एक ओवरकोट भी. निकलते
ही एक लड़का दिखाई देता है, वह एक बड़े से काले बोर्ड पे मेनू लिख रहा है.
उसे दिखाई दे रहा है की मैं अपने पैर को थोड़ा धीरे से संभल कर रख रही हूँ.
अब फिर से दर्द होने लगा था, मैंने उसीके सामने फीते खोले और हाथ में जूतों
को टान लिया. उसने अंगूठा सहमति में दिखाया। बस, इसी गली के बाहर से मुझे
चार्ल्स ब्रिज की और जाना है. तलवों में थोड़ी सी ठण्ड तो लगती है, लेकिन
सड़कों से बात-चीत भी होती है. बसों के निशान जैसे कुछ भाग में मेरे हिस्से
बँट गयी हो. इस शहर में कागज़ बहुत हैं शायद, हर पग पर किसी कागज़ का सिरा
मेरे नंगे पैरों से टकराता है। एक दो बार उठा कर भी देखा, ज़्यादातर
म्युज़ीयम्स के, कुछ ओर्केस्ट्रा के, तो कुछ कार्निवल के. पैर नीचे से काले
से हो गए हैं, नहीं शायद मैल नहीं। भला शहरों का भी मैल हुआ करता है क्या!
चार्ल्स
ब्रिज पर आज बहुत भीड़ है, इस ब्रिज पर हर थोड़े दूर में एक स्तम्भ और
मूर्ति है, मगर यहाँ मेरे पैरों में खुरदुरे रास्ते की चुभन होती है. मगर
ये नदी इतनी सुन्दर से कि मन नहीं करता आगे बढ़ने को. कई बार हम शायद दर्द
को तौलते हैं, कई बार हम न चाहकर भी अपनी दर्द, ख़ुशी को तवज्जो देते हैं.
फैसले ऐसे ही होते होंगे, छोटे, बड़े. और पैरों की चुभन को तो बर्दाश्त किया
ही जाना चाहिए. आगे बहुत आवाज आ रही है. एक बाग़ है, जहाँ काफी लोग जमा
हैं. हर कोई नारंगी रंग के फूलों की माला पहन के जा रहा है. वहां एक लड़की
जोर से गाने लगाकर सबको डांस सीखा रही है. यहीं आ गयी हुँ. मैंने भी पुछा,
क्या मैं कर सकती हूँ? उस ने बड़े से मुस्कान के साथ कहा, हाँ! यहाँ तो घास
है, मुलायम घास को महसूस करना शायद कुछ बेहतरीन चीज़ों में से एक है. जोर
से पैर पटकने पर, नीचे की ज़मीन भी स्पर्श होती है. ऐसा नहीं है की इसकी वजह
से मैं आगे घास के बारे में न सोचुं. कई बार कुछ चीज़ें दर्द देती हैं, मगर
वो दुःख नहीं देतीं। भेद है इन दोनों में.
शाम को पैरों में कांच की चुभन, कुछ लोग इतने खुश हैं यहाँ की उन्होंने बोतलें यूँ ही फ़ेंक दी हैं. लेकिन उनके इतने छोटे टुकड़े हैं कि पैरों में वो बस हलके से चुभते हैं, उनके होते हुए भी मैं चल पाती हूँ.
कई बार सिर्फ ध्यान देने पर कांच दिखाई देते हैं, कई बार बस महसूस होते
हैं. मगर सफर रुकता नहीं। जिन्होंने ये बोतलें फेंकी हैं, उन में से कुछ
लड़के-लड़कियां हाथ थामे हैं, जैसे फेंकना गुनाह नहीं था, वैसे इस तरह भरी
सड़क में खड़े रहना भी गुनाह नहीं हुआ । आज़ादी हर उस छोटे से अवकाश में होती है, जब आप कुछ और भी कर सकते थे.
रात की सड़क, होटल की सीढियाँ, कुछ बिखरे पत्ते और वो कमरा। यहीं मेरे नंगे पैर थक के चूर हुए, और मुझसे दूर कहीं सो गये.